क्या है ब्लैक होल ?
क्या है ब्लैक होल?
ब्लैक होल अत्यधिक घनत्व तथा द्रव्यमान वाले ऐसे आकाशीय पिंड होते हैं, जो आकार में बहुत छोटे होते हैं। इसके अंदर गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक होता है कि उसके चंगुल से प्रकाश की किरणें बाहर नहीं निकल पातीं। चूँकि यह प्रकाश की किरणों को सोख लेता है, इसीलिए यह अदृश्य बना रहता है। इसकी उपस्थिति का ज्ञान इसकी अन्य पदार्थों के साथ परस्पर क्रिया (इंटरेक्शन) द्वारा किया जा सकता है। ब्लैक होल वास्तव में एक गड्ढा है, जिसमें गिरने के बाद कुछ भी वापस नहीं आता, यहाँ तक कि प्रकाश भी नहीं । यद्यपि अब वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने सिद्ध कर दिया है कि गामा किरणें अपनी अधिक ऊर्जा के बल पर इससे बाहर निकल सकती हैं।
ब्लैक होल की उत्पत्ति
जब किसी बड़े तारे का पूरा-का-पूरा ईंधन जल जाता है तो उसमें एक जबरदस्त विस्फोट होता है, जिसे 'सुपरनोवा' कहते हैं। विस्फोट के बाद जो पदार्थ बचता है, वह धीरे-धीरे सिकुड़ना शुरू होता है और बहुत घने पिंड का रूप ले लेता है, जिसे 'न्यूट्रॉन स्टार' कहते हैं। अगर यह न्यूट्रॉन स्टार बहुत विशाल है तो गुरुत्वाकर्षण का दबाव इतना होगा कि वह अपने ही बोझ से सिमटता चला जाएगा और इतना घना हो जाएगा कि ब्लैक होल बन जाएगा। ।
अमेरिकी भौतिकीविद् जॉन व्हीलर ने वर्ष 1967 में पहली बार इन पिंडों के लिए 'ब्लैक होल' शब्द का उपयोग किया। यदि पृथ्वी के पदार्थों का घनत्व लाखों-करोड़ों गुना अधिक हो जाए तथा इसके आकार को संकुचित करके 1.5 सेंटीमीटर छोटा कर दिया जाए तो ऐसी अवस्था में प्रबल गुरुत्वाकर्षण बल के कारण पृथ्वी भी प्रकाश-किरणों को उत्सर्जित नहीं कर सकेगी और यह एक ब्लैक होल बन जाएगी। किसी भी ब्लैक होल में द्रव्यमान की तुलना में घनत्व अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होता है। यदि सूर्य को संकुचित करके इसकी 7,00,000 किलोमीटर की त्रिज्या को 3 किलोमीटर में परिवर्तित कर दिया जाए, तो यह भी ब्लैक होल बन जाएगा।

कोई टिप्पणी नहीं